Saturday, 16 May 2015

साम्प्रदायिक सौहार्द्र पर खतरा

नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में बी जे पी तथा उसके सहयोगी दलों ने पिछले लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की थी; जिसका एक वर्ष पूरा होने जा रहा है. जिस “विकास” के रथ पर सवार होकर मोदी जी ने यह सफलता प्राप्त की – उस ओर उनके कदम लगातार बढ़ रहे हैं. परन्तु, मोदी जी के पीछे हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन भी थे; जिन्हें लगता है कि अब भारत को “हिन्दू राष्ट्र” बनाने का वक्त आ गया है. वे लगातार साम्प्रदायिक और उन्मादी भाषा बोल रहे हैं. दूसरी तरफ, तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने “धर्मनिरपेक्षता” की आड़ में, मुस्लिम एवं अन्य अल्पसंख्यक वर्गों के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपना कर, “धर्मनिरपेक्षता” को बदनाम कर दिया है. इसी कारण हिन्दुओं का एक बड़ा वर्ग, हिन्दू साम्प्रदायिक व्यक्तियों एवं संगठनों के बहकावे में आकर, भड़क रहा है. साम्प्रदायिक सौहार्द्र को बिगाड़ने वाले पोस्ट को फेसबुक और सोशल मीडिया पर जिस तरह से समर्थन मिल रहा है; वह खतरे की घंटी है. इसका सामना सबसे पहले नरेन्द्र मोदी जी को ही करना पड़ेगा.

नरेन्द्र मोदी जी कभी साम्प्रदायिकता की बात नहीं करते; हमेशा “साम्प्रदायिक सौहार्द्र” की बात करते हैं; विकास की बात करते हैं. किन्तु, मोदीजी के समर्थन का ढोंग करने वाले साम्प्रदायिक लोग विषाक्त वातावरण तैयार कर रहे हैं. वे भारतीय इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना चाहते हैं. जिस प्रकार से पाकिस्तान में इतिहास को वहां के मुस्लिम सम्प्रदायिक्तावादियों ने “मुस्लिम दृष्टिकोण” से पाकिस्तान का इतिहास लिख दिया है; ठीक उसी प्रकार से हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन और व्यक्ति भी “हिन्दू दृष्टिकोण” से भारत का इतिहास लिखना चाहते हैं.

 हिन्दू सम्प्रदायिक्तावादियों ने सोची समझी रणनीति के तहत सबसे पहला प्रहार किया है राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी पर. कांग्रेस का विरोध करना हो, तो गांधीजी का विरोध; नरेन्द्र मोदी जी का समर्थन करना हो, तो गांधीजी का विरोध; तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों के मुस्लिम तुष्टिकरण का विरोध करना हो, तो गांधीजी का विरोध; भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुभाष चन्द्र बोस की शहादत को सम्मान देना हो, तो गांधीजी का विरोध; यहाँ तक कि अरविन्द केजरीवाल और “आप” का विरोध करने के लिए भी गांधीजी की आलोचना!
    
 भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है. निःसंदेह मजदूरों, किसानों, नौजवानों, महिलाओं, हरिजनों, आदिवासिओं, हिन्दुओं, मुसलमानों – कहने का अर्थ है कि आम जनता को राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने में क्रान्तिकारियों, मजदूरों और किसानों के संगठनों, युवाओं और लेखकों के संगठनों, कम्युनिस्ट तथा वामपंथी संगठनों एवं अन्य विभिन्न शक्तियों का योगदान रहा है; परन्तु कांग्रेस ने गांधीजी के नेतृत्व में उन्हें एकसूत्र में पिरोया. सबों के सम्मिलित प्रयासों से हमें यह आजादी मिली. योगदान किसी का कम, या किसी का ज्यादा हो सकता है; परन्तु ये सारे ही देशभक्त मातृभूमि के प्रति अपने निःस्वार्थ त्याग के लिए, हमारे लिए वान्द्निये हैं.

 भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान गाँधी-नेहरु, गाँधी-सुभाष, नेहरु-सुभाष, सुभाष-कम्युनिस्ट, नेहरु-वल्लवभाई पटेल – विभिन्न नेताओं में मतभेद थे; लेकिन उनमें नैतिकता का स्तर काफी ऊँचा था. उन्होंने अपने मतभेदों को राष्ट्रहित पर, कभी हावी होने नहीं दिया. 1939 में कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में पट्टाभिसीतारमैया के विरुद्ध जब सुभाष चन्द्र बोस जीत गए, तो गाँधी जी ने सार्वजानिक रूप से स्वीकार किया - “पट्टाभिसीतारमैया की हार, उनसे अधिक मेरी हार है.” कांग्रेस कार्यसमिति की गाँधी जी में निष्ठा के कारण, जब सुभाष जी काम नहीं कर सके; तो नैतिकता के आधार पर उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया. इतनी ईमानदारी आप कहाँ देखेंगे? उनसे आज के तमाम राजनितिक दलों को सीख लेनी चाहिए.


देश “विकास के रथ के पहिये” पर चल पड़ा है. यदि हमारे साम्प्रदायिक सौहार्द्र को चोट पहुंची, तो विकास का जो ताना-बना प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी बुन रहे हैं – वह सब धराशायी हो जायेगा.    

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