Friday, 15 May 2015

महिला सशक्तिकरण : हमारी प्रथम प्राथमिकता

हमने बहुत प्रगति की है; चाँद तक जा पहुंचे हैं. हमारा तकनीकि विकास द्रुत गति से हो रहा है; लेकिन हमारी यह प्रगति कोई मायने नहीं रखती, यदि विश्व की आधी आबादी, अर्थात महिलाओं का विकास नहीं होता; उन्हें सम्मान नहीं मिलता और वे खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं.

परिवार इंसान की प्रथम पाठशाला है। प्रायः किसी व्यक्ति के जीवन पर सबसे ज्यादा प्रभाव उसकी माता का पड़ता है। शिवाजी, "शिवाजी" नहीं होते और शेरशाह, "शेरशाह" नहीं होते - यदि उनकी परवरिश उनकी साहसी "माताओं" ने नहीं की होती। शिवाजी तथा शेरशाह - दोनों की माताएँ, अपने पतियों की दूसरी बीबियाँ थीं, जो पति द्वारा एक तरह से परित्यकत थीं। इन माताओं ने साहस के साथ इन विषम परिस्थितियों का सामना किया और अपने बेटों को ऐसा "वीर" इंसान बनाया, जिसपर भारतीय इतिहास गर्व करता है।

"रेप" से लेकर महिला उत्पीड़न की विभिन्न घटनाएँ इस बात का सबूत है कि हम महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते, या मात्र दिखावा करते हैं। अपनी पत्नी को हम सम्मान न दें; उन्हें मारे-पीटें, गाली-गलौज करें - ऐसी दबी-कुचली नारी, भला अपने बच्चे को कैसा "चरित्र" दे पाएगी? ऊपर से हमारी "शिक्षा पद्धति" ने रही-सही कसर पूरी कर दी है; जिसमें "धन" ही सबकुछ है; इंसानियत, भाईचारा, रिश्ते-नाते - सब पीछे छूट गए हैं।


लोगों से ही ये समाज बना है और समाज से ही इनपुट मिलता है राजनीति, प्रशासन, फिल्म और मीडिया को। दरअसल ये सभी हमारे समाज का दर्पण हैं। 8 मार्च को हम लोग हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मानते हैं. परन्तु, यदि हम अपनी नजरों में महिलाओं को सिर्फ बराबरी का दर्जा दे दें और उन्हें सम्मान की नज़र से देखना शुरू कर दें, तो परिवर्तन की शुरुआत हो जाए!

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